Sunday, June 26, 2022
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लोक संस्कृति शोध संस्थान की सचिव ने स्कूली बच्चों से किया संवाद 

 

लखनऊ। लोक संस्कृति शोध संस्थान द्वारा प्रतिमाह आयोजित की जाने वाली ‘दादी-नानी की कहानी’ श्रृंखला में इस बार सरोजनीनगर के प्राथमिक विद्यालय समदा में मेहनत और आलस कहानी सुनाई गयी। बच्चों की कल्पना शक्ति के विकास, प्रेरणा एवं कथा-कहानी के माध्यम से नैतिक मूल्यों के प्रसार हेतु बुधवार को हुए कार्यक्रम में स्टोरीमैन जीतेश श्रीवास्तव ने बच्चों को आलस और बेईमानी के दुष्प्रभाव तथा मेहनत और ईमानदारी से काम करने के महत्व को बखूबी समझाया। प्राथमिक विद्यालय समदा की प्रधानाध्यापिका सुश्री मीनू, सहायक अध्यापिका अनुपमा सिंह, शिक्षामित्र श्रीमती फुलकुमारी ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष द्विवेदी एवं लोक संस्कृति शोध संस्थान की सचिव सुधा द्विवेदी ने स्कूली बच्चों से संवाद किया।

कार्यक्रम की शुरुआत बच्चों को दिये कठिन वाक्य के उच्चारण अभ्यास और मनोरंजक खेल से हुई। आकृति एवं वेदिका ने यह लघु सरिता का बहता जल कविता सुनाई। कक्षा पांच की काजल ने विमल इन्दु की विशाल किरणें… कक्षा तीन की वेदिका, कक्षा चार की आंचल और कक्षा तीन की मान्या ने शाम सबेरे देखूं तुझको कितना सुन्दर रूप है… सुनाया। इस अवसर पर श्रीमती स्मिता द्विवेदी, लक्ष्मीकान्त, अमित रावत, योगेश, श्रीमती कुसुमा व सुशीला आदि उपस्थित रहे।

रेशमा को मिला ईमानदारी का फल :

कहानी की शुरुआत रेशमा नामक बच्ची से होती है जिसकी मां का देहान्त हो चुका है। विमाता भानुमती का एक पुत्र शेरा है जो अतिशय लाड़ व प्यार में आलसी हो चुका है। भानुमती हमेशा रेशमा पर अत्याचार करती है। समय के साथ दोनों बड़े होने लगते हैं। भानुमती पैसों के लिए रेशमा को किसी के घर की नौकरानी बनाना चाहती है किन्तु पिता नाराज होता है। रेशमा अपने पिता से कहती है कि आप परेशान न हों, मैं कल से काम ढूंढ़ने जाऊंगी। अगले दिन पिता रेशमा को यह सीख देता है कि कोई भी काम पूरी लगन, मेहनत और ईमानदारी से करना। पिता की सीख काम आती है तथा वह इसकी बदौलत खूब कमाकर घर लौटती है। इससे प्रभावित होकर भानुमती अपने आलसी व कामचोर बेटे को काम पर भेजती है जिसे अपनी आदतों के चलते निराशा हाथ लगती है। कहानी में बताया गया कि जीवन में मिली अच्छी सीख को मानना चाहिए तथा काम को मेहनत और ईमानदारी से करना चाहिए।

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